मुहल्ला बिल्लीमारान या बल्लीमारान?

बल्लीमाराँ के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ…

गुलज़ार की ये नज़्म तो ग़ालिब टी.वी. सीरियल में हम सब ने सुनी है।

पुरानी दिल्ली। मुहल्ला बल्लीमारान।

हम सब ने यही नाम हर जगह पढ़ा-सुना है। यही नाम सरकारी बोर्ड्स पर भी लिखा हुआ है। तो ये बल्लीमारान-बिल्लीमारान की बहस शुरू कहाँ से हुई?

मेरे लिए ये सवाल शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी सा़हब के एक वीडियो से पैदा हुआ सो मैं आपको भी मौज़ू की तरफ़ उसी रास्ते से ले चलता हूँ। फ़ारूक़ी साहब एक ‌वीडियो में मीर की मस्नवी ‘मोहनी बिल्ली’ पढ़ कर सुना रहे थे। मस्नवी का क़ब्ल-अज़-माबाद शेर उन्होंने यूँ पढ़ा:

सब्र बिन चारा न था आख़िर किया
बिल्लीमारों में उसे गड़वा दिया

इस शेर की वज़ाहत करते हुए वो कहते हैं:

‘अब जोक देखिए यहाँ पर। बिल्ली मरी है तो एक मुहल्ला है दिल्ली में बिल्लीमाराँ नाम का। अब इस नाम की जो भी वज्ह रही हो।’ सवाल ये है कि क्या मीर ने बिल्ली की मुनासिबत से बिल्लीमारों का मुहल्ला लिखा है या नहीं?

जब मैं ने इस मौज़ू पर मज़ीद पढ़ने की कोशिश की तो महमूदुल-हसन साहब का ख़ुर्शीद रिज़्वी साहब की दरियाफ़्त के हवाले से एक मज़्मून मिला। इस मज़्मून में मशहूर मुअर्रिख़ विलियम डेलरिम्पल की किताब ‘City of Djinns : A year in Delhi’ का ज़िक्र था। इस किताब में उन्होंने मुहल्ले का नाम बिल्लीमारान दर्ज किया है जिस का तर्जुमा उन्होंने ‘street of the cat killers’ किया है। इस मज़्मून में उन्होंने इस नाम को सही गर्दानते हुए कुछ हवाले भी दिए हैं। पहला हवाला तो ‘मोहनी बिल्ली’ का ही है। इस के बाद उन्होंने ग़ालिब के ख़ुतूत के हवाले दिए हैं।

दूसरा हवाला ग़ालिब का वो ख़त है जो उन्होंने मीर मेहदी मजरूह को लिखा था।

“अहल-ए-इस्लाम में सिर्फ़ तीन आदमी बाक़ी हैं। मेरठ में मुस्तफ़ा ख़ाँ, सुल्तान जी में सद्रुद्दीन ख़ाँ और ‘बिल्लीमारों’ में सग-ए-दुनिया मौसूम-ब-असद।”

इस इक़्तिबास के हवाले से वो लिखते हैं कि यहाँ कुत्ते, बिल्ली और शेर की मुनासिबत से फ़ायदा उठाया गया है।

तीसरा हवाला (मेरी नज़र में) इस ज़िम्न में एक मुस्तहकम दलील है। ग़ालिब ने हरगोपाल तफ़्ता को एक ख़त में लिखा है:

“हाँ आप ने सरनामे पर ‘चाह-ए-गर्माबा’ लिखा। मैं ये नहीं लिख सकता। किस वास्ते कि ये ‘हम्माम के कुँए’ की मिट्टी ख़राब कर कर उस को ‘चाह-ए-गर्माबा’ लिखा है। अस्मा-ओ-आलाम का तर्जुमा फ़ारसी में करना, ये ख़िलाफ़-ए-दस्तूर तहरीर है। भला इस शहर में एक मुहल्ला ‘बिल्लीमारों’ का है। अब हम इस को ‘गुर्बा-कुशाँ’ क्योंकर लिखें? या इमली के मुहल्ले को ‘मुहल्ला तमर-हिंदी’ किस तरह लिखें?”

गुर्बा फ़ारसी में बिल्ली को कहते हैं। गुर्बा-कुशाँ यानी बिल्लीमार।

इसी तरह की बात ग़ालिब ने क़द्र बिलग्रामी को लिखे एक ख़त में की है। “एक जगह से मुझ को ख़त आया। चूँकि मैं ‘बिल्लीमारों’ के मुहल्ले में रहता हूँ उस ने पता लिखा : ‘दर मुहल्ला गुर्बा-कुशाँ’ लिखा। वाह फ़ारसी।”

इस ख़त में ग़ालिब के बयान को महज़ एक मज़ाक़ से ताबीर किया जा सकता है लेकिन ‘तफ़्ता’ को लिखे ख़त में ये बात बिल्कुल वाज़ेह हो जाती है कि कम-अज़-कम ग़ालिब के नज़्दीक मुहल्ले का नाम बिल्लीमारों था।

अब मुहल्ले का नाम बिल्लीमारों क्यों था? हालाँकि इस बात का कोई सुबूत नहीं मिलता लेकिन इस हवाले से एक बात ये कही जाती है कि एक ज़माने में यहाँ साहँसी या साँसी लोग रहते थे जो कुत्ते-बिल्लियों का गोश्त खाया करते थे। इसलिए इस मुहल्ले को ‘बिल्लीमारों’ का मुहल्ला कहा जाता है।

‘बल्लीमारों’ का दावा करने वाले लोग कहते हैं कि ये मल्लाहों की बस्ती थी। बल्ली से मुराद बाँस या एक मज़्बूत लकड़ी से है। और ‘बल्ली मारना’ नाव खेने के माना में इस्तिमाल होता है। इस के भी सुबूत नहीं मिलते। अली अकबर नातिक़ ने इस हवाले से अपने एक मज़्मून में लिखा है कि बल्लीमारों कभी मल्लाहों का मुहल्ला था ही नहीं चूँकि जमुना कभी इस इलाक़े से नहीं गुज़री। और जब नदी ही नहीं तो मल्लाह के होने का क्या मतलब? आगे उन्होंने बयान किया है कि बल्ली हमेशा एक मज़्बूत लकड़ी को कहा जाता है। तुरखान बल्लियों का काम किया करते थे, जिन्हें बल्लीमाल या बल्लीमार कहते थे, यहाँ रहा करते थे, इसी निस्बत से इस जगह का नाम बल्लीमारान पड़ा। उन्होंने अपने मज़्मून में ‘बिल्लीमाराँ’ नाम के ह‌क़ में बोलने वालों को अंग्रेज़ों का पैरो बताया है जो किसी अंग्रेज़ की ग़लती को भी सही साबित करने की होड़ में लगे हुए हैं। उन्होंने ग़ालिब के ख़ुतूत से जो हवाले पेश किए गए हैं, उन्हें महज़ रिआयत-ए-लफ़्ज़ी बताया है और लिखा है कि ज़ियादा-तर लोग नहीं जानते कि दो हम-हिज्जे लफ़्ज़ जिनका तलफ़्फ़ुज़ अलग हो, रिआयत-ए-लफ़्ज़ी के लिए इस्तिमाल हो सकते हैं।

लेकिन ग़ालिब का तफ़्ता के नाम वो ख़त?

महमूदुल-हसन साहब ने अपने मज़्मून में निसार अहमद फ़ारूक़ी साहब से एक गुफ़्तगू भी दर्ज की है। जब उन्होंने निसार साहब से पूछा कि अवाम मस्लन रिक्शे वाले क्या तलफ़्फ़ुज़ इस्तेमाल करते हैं तो निसार साहब ने बिल्लीमाराँ ही बताया।

जब मैंने उस वक़्त के दस्तावेज़ तलाशने की कोशिश की तो मुझे 1883-84 का गज़ेटियर मिला। उस में हर जगह मुहल्ले का नाम ‘बल्लीमाराँ’ ही दर्ज है। यानी हम हतमी तौर पर ये कह सकते हैं कि ग़ालिब के इन्तिक़ाल के कुछ बरस बाद ही ये तलफ़्फ़ुज़ (भी) इस्तिमाल में आता था। शायद ये मुहल्ला हमेशा से दोनों नामों से जाना जाता रहा हो। या ऐसा न भी हो।

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